Ads

समाजिक विवेचना एवं विचार

                                   नागरीक की समाज के प्रति जिम्मेदारी और समझ 





मनुष्य एक समाजिक प्राणी है समाज का निर्माण मनुष्यों द्वारा किया जाता है| समय के साथ सब कुछ परिवर्तनशील है|समय के अनुसार समाज भी अपने सोच के साथ बदलता रहता है | बदलाव एक शास्वत प्रक्रिया है तथा बदलाव अस्तित्व बनाये रखने के लिए जरूरी प्रक्रिया है|ये परिवर्तन सकारात्मक होना चाहिए | तभी हम कह सकते है की समाज समय के साथ विकास कर रहा है |इसके लिए अनेक कारको का प्रभाव  होता है |ये प्रभाव ऐसा होना चाहिए जिसमे मनुष्य ,समाज तथा देश का भला निहित हो |         कहने को तो कहा जाता है कि मनुष्य से समाज बनता है तथा समाज से देश दुनिया का निर्माण होता है | इस प्रक्रिया के लिए सबसे पहले एक श्रेष्ट मनुष्य होना महत्वपूर्ण है तभी जाकर आगे की प्रक्रिया पूरी होगी |प्राचीन काल में समाज का दिशा निर्देश और नेतृत्व बड़े बुजुर्ग तथा बुद्धिजीवी लोग किया करते थे |उस समय लोगों  में में नैतिकता, ईमानदारी एवं निःस्वार्थ की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी |क्या आज-कल भी यह नियम लागु है इसका उतर एक चुनौती भरा होगा |
         समाजिक बदलाव के कारको में शिक्षा,राजनीति,धर्म एवं सरकारों आदि का योगदान रहता है |आज-कल वे लोग समाज के ठेकेदार बने बैठे है या प्रभावित करते है जिसमे लोभ-लालच,स्वार्थ आदि की भावना से ग्रसित है |ये ज्यादतर लोग या तो धार्मिक होते है या राजनितिक | अपने आपको समझदार एवं शिक्षित साबित करते रहते  है परन्तु, वास्तव में ये लोग स्वार्थी तथा लोभी होते है |इनको समाज से कुछ लेना देना नही है इनकी अपनी स्वार्थ की पूर्ति होनी चाहिए भले ही देश और दुनिया गर्त में चला जाय |यही लोग समाज को गुमराह करके अपने लिए  राजनीति एवं धर्म के लिए रास्ता बनाते है और इसका ठेकेदार बन बैठते है |और इसका नियमन करने लगते है, इनको कोई फर्क नही पड़ता की इनके स्वर्थ के चलते मानव मूल्यों का ह्रास होता है |शिक्षा के आभाव में जनता एक निरीह प्राणी भर बनकर रह जाती है सही गलत का फर्क करना उनके लिए मुस्किल हो जाता है |


          आज-कल इन्सान की फितरत लालची ,स्वार्थी ,आलसी एवं द्वेषवाला हो गया है, ऐसे लोगो से उम्मीद करना कि कुछ अच्छा करेगे बेकार बात लगती है एवं ऐसे लोगो की तायदाद ज्यादा है  |कुछ लोग अच्छे एवं स्वस्थ मानसिकता के भी है जिनका प्रभाव समाज पर पड़ता है लेकिन इनकी संख्या कम है | इससे यह साबित होता है की हमारी शिक्षा प्रणाली कही न कही ऐसे लोगो के निर्माण करने में पीछे रह जाती है |श्रेष्ठ नागरिक निर्माण में शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान रहता है | अत:शिक्षा प्रणाली में आमूल चूर परिवर्तन की जरुरत है | लेकिन प्रश्न उठता है की इसपर सोचेगा कौन? क्योकिं व्यवस्था परिवर्तन की जिम्मेदारी विकृत मानशिकता वाले लोगो पर है |
सरकारें बनती है देश के राजनितिक पार्टियों से और इन राजनितिक पार्टियों में समाज के लोभी-स्वार्थी एवं अपराधिक छवि के राजनेता तथाकथित देश के ठेकेदार बैठे हुए है | हमारे धीमी रफ्तार वाली न्याय प्रणाली इनको रोक पाने में असमर्थ दिखाई देती है जिसका फायदा उठाकर संगीन अपराधी भी सता में आ जाता है और अपने अनुकूल विधि निर्माण करने लगता है | इनका सिद्धांत होता है कि देश जाय भांड में अपना भला होना चाहिए| इस तरह की परिपार्टी की जिम्मेदारी को रोक पाने में संवैधानिक संस्थाएं असफल साबित हो रही है क्योंकि इन सभी का राजनीतिकरण हो गया है | सता आते ही सभी राजनितिक पार्टियाँ देश के  संवैधानिक संस्थाओ में अपने पसंद के लोगो का समावेश कर देती है और ये लोग अपने स्वार्थ के चलते संवैधानिक मूल्यों का सौदा अपने फायदे के लिए करने लगते है |                इस समाजिक बदलाव के लिए धर्म भी पीछे नही है इसका भी बढ़ चढ़ हिस्सेदारी है |प्राचीन काल में धर्म में विशुद्ध रूप से साधुवाद,परोपकार एवं मानवतावाद था | लेकिन आधुनिक परिद्देश्य में इन मूल्यों का लगभग समापन हो गया है |आधुनिग समय में धर्म का भी राजनीतिकरण एवं अपराधीकरण हो गया है |जिस समाज के साधू संत भी जेल जाने लगे तो इससे बुरा क्या हो सकता है यह एक सोचने वाली बात है |          अत: जरूरी हो गया है कि कुछ भी बनने से अच्छा है कि सबसे पहले एक अच्छा इन्सान बने जिसमे मानवता एवं प्रकृतिवादी भावना से परिपूर्ण हो तभी जाकर एक सभ्य समाज का निर्माण हो सकता है जिसमे सबका विकास एवं भलाई निहित होगा | इस पर विचार करने की जिम्मेदारी प्रत्येक नागरिक की है | 

                                                                                                                                                                             DATE: 10 AUGUST 2020

Popular Posts